Published by: Up Times Live Team
Updated: 10 April, 2026 (Friday, 11:15am)IST
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनावी रणभेरी बजने से पहले राजनीतिक दलों के बीच नैरेटिव की जंग निर्णायक मोड़ पर आ गई है। प्रदेश की भाजपा सरकार ने 1.43 लाख शिक्षामित्रों के मानदेय में 8,000 रुपये की एकमुश्त बढ़ोतरी कर विपक्ष के ‘आक्रामक एजेंडे’ की हवा निकालने की कोशिश की है। वहीं, समाजवादी पार्टी इस बढ़त को ‘राहत बनाम हक’ की बहस में उलझाकर अपने वोट बैंक को बचाने की कवायद में जुट गई है।
18 हजार का ‘मास्टरस्ट्रोक’ या चुनावी मरहम?
योगी सरकार द्वारा मानदेय को 10 हजार से बढ़ाकर 18 हजार रुपये करना सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सियासी रणनीति है। इसके जरिए भाजपा ने:
- प्राथमिक शिक्षा के मुद्दे पर सपा के तीखे हमलों को कुंद किया है।
- शिक्षामित्रों के बड़े सामाजिक नेटवर्क और उनके परिवारों (वोट बैंक) में पैठ बनाने की कोशिश की है।
- स्कूलों के विलय जैसे संवेदनशील मुद्दों पर विपक्ष की घेराबंदी को कमजोर किया है।
सपा का काउंटर नैरेटिव: ‘सम्मान की लड़ाई अभी बाकी’
भाजपा के इस कदम से पैदा हुए जोखिम को भांपते हुए अखिलेश यादव ने मोर्चा संभाल लिया है। सपा अब शिक्षामित्रों के बीच ‘अधूरा न्याय’ का संदेश दे रही है। सपा का तर्क है कि:
“2014-15 में हमने शिक्षामित्रों को 40 हजार का वेतन और सहायक शिक्षक का सम्मान दिया था। भाजपा ने उन्हें केवल ‘गुजारा भत्ता’ दिया है, उनका हक (समायोजन) नहीं।”
सपा प्रमुख द्वारा शिक्षामित्रों को लिखा गया खुला पत्र और ‘सपा शिक्षक सभा’ की सक्रियता साफ बताती है कि पार्टी इस वर्ग के भीतर मौजूद असंतोष को ठंडा नहीं होने देना चाहती।
मुद्दा अब ‘बोनस’ का नहीं, ‘भरोसे’ का है:
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अब यह लड़ाई सिर्फ रुपयों तक सीमित नहीं रही। यह ‘सम्मान, स्थायित्व और भरोसे’ की जंग बन चुकी है।
- भाजपा का दावा: हमने विपरीत परिस्थितियों और अदालती पेच के बावजूद मानदेय लगभग दोगुना कर ‘राहत’ दी।
- सपा का दावा: हम सत्ता में आए तो ‘पूर्ण सम्मान’ और पुरानी स्थिति बहाल करेंगे।












