खाकी की आड़ में ‘काली कमाई’ का खेल: निचलौल थाने में न्याय नहीं, बोलियां लगती हैं!

Reported by: Girajesh Kumar Gupta 

Edited by: Amit Yadav

Updated: 10 May, 2026 (Sunday, 10:15am)IST

महराजगंज/निचलौल: यूपी पुलिस का ‘मित्र पुलिस’ का नारा निचलौल सीमा पर दम तोड़ता नजर आ रहा है। यहाँ पीड़ितों की सिसकियों से ज्यादा दलालों के ठहाकों की गूंज सुनाई देती है। निचलौल थाना इन दिनों अपराध रोकने के लिए नहीं, बल्कि अपराधों के ‘निपटारे’ और ‘वसूली सिंडिकेट’ के संचालन के लिए चर्चा में है।

वर्दी के रसूख तले दलालों का ‘अघोषित दफ्तर’

सूत्रों की मानें तो थाने के भीतर फरियादियों से पहले बिचौलियों का स्वागत होता है। आलम यह है कि थाने के ‘खास’ सिपाही सीधे पीड़ितों से बात करने के बजाय उन्हें अपने पालतू दलालों के पास भेज देते हैं। यहाँ हर कलम चलने की कीमत तय है।

केस स्टडी: इंसाफ के नाम पर ठगी का शिकार हुआ रविन्द्र

भ्रष्टाचार की इस बहती गंगा का ताजा शिकार सिरौली गांव का रविन्द्र बना। पिता-पुत्र के जमीनी विवाद में सुलह कराने के नाम पर थाने के चहेते आरक्षी फैज खान और दिलीप सिंह ने कथित तौर पर रक्षक से भक्षक की भूमिका निभाई। आरोप है कि रविन्द्र को डरा-धमकाकर ₹50,000 की मोटी रकम डकार ली गई। हद तो तब हो गई जब समझौते के कागजात मांगने पर ₹5,000 की और मांग की गई। सवाल यह है कि क्या यह पैसा सिर्फ सिपाहियों की जेब में जा रहा है या ऊपर तक इसका हिस्सा पहुंचता है?

रेट कार्ड’ से चलता है थाना

विश्वस्त सूत्रों ने थाने के भीतर चल रहे ‘रेट कार्ड’ का पर्दाफाश किया है:

  • दबंगई/मारपीट: ₹3,000 से ₹5,000
  • FIR का ‘मैनेजमेंट’: ₹10,000 से ₹25,000
  • जमीन का कब्जा: विवाद के अनुसार ‘लाखों’ में सौदा

रेस्टोरेंट या अय्याशी के अड्डे?

निचलौल कस्बे और दमकी गांव के पास स्थित कुछ रेस्टोरेंट अब परिवारों के बैठने लायक नहीं रहे। आरोप है कि इन ठिकानों पर ‘जिस्मफरोशी’ का अवैध कारोबार पुलिस की सरपरस्ती में फल-फूल रहा है। थानाध्यक्ष के ‘कारखास’ सिपाही यहाँ नियमित रूप से हाजिरी भरते हैं, जिसका मकसद कानून का डंडा चलाना नहीं बल्कि ‘महीने की उगाही’ सुनिश्चित करना होता है।

वरिष्ठ अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल

क्या महाराजगंज के आला अधिकारी इस संगठित भ्रष्टाचार से अनजान हैं? या फिर निचलौल थाने से निकलने वाली ‘काली कमाई’ की चमक ने ऊपर तक सबकी आंखों पर पट्टी बांध दी है? जब रक्षक ही दलालों के एजेंट बन जाएं, तो आम आदमी न्याय के लिए कहाँ जाए?

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