सबरीमाला बेंच में गूँजा बोहरा समाज का ‘खतना’ मामला: ‘धार्मिक आज़ादी’ या ‘स्वास्थ्य का अधिकार’, क्या है सर्वोच्च?

Published by: Up Times Live Team 

Updated: 09 May, 2026 (Saturday, 02:21pm)IST

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ के सामने सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित ‘फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन’ (FGM) यानी ‘खतना’ की प्रथा पर एक ऐतिहासिक और तीखी बहस छिड़ गई है। कोर्ट ने इस प्रथा पर गहरी चिंता जताते हुए संकेत दिया है कि महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा से जुड़े अधिकार किसी भी धार्मिक स्वतंत्रता से ऊपर हो सकते हैं।

संविधान की कसौटी पर आस्था

मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली पीठ के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता असीमित है? सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “इस प्रथा को रोकने के लिए शायद जटिल संवैधानिक व्याख्याओं की जरूरत न पड़े। अनुच्छेद 25 स्पष्ट करता है कि धार्मिक स्वतंत्रता ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य’ के अधीन है। FGM के मामले में सिर्फ स्वास्थ्य शब्द ही इस पर रोक लगाने के लिए काफी हो सकता है।”

याचिकाकर्ताओं की दलील: ‘7 साल की बच्चियों को स्थायी नुकसान’

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने दहला देने वाले तथ्य रखे। उन्होंने बताया:

  1. यह प्रथा मात्र 7 साल की बच्चियों पर की जाती है, जो सहमति देने में असमर्थ हैं।
  2. इस प्रक्रिया में महिलाओं की 10,000 से अधिक नर्व एंडिंग्स (तंत्रिका-सिरे) को ऐसा नुकसान पहुँचता है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।
  3. यह न केवल शारीरिक बल्कि गहरा मानसिक और भावनात्मक आघात है।
  4. समुदाय के भीतर बहिष्कार का डर लोगों को इस अमानवीय प्रथा को मानने पर मजबूर करता है।

विपक्ष का तर्क: ‘यह अंग-भंग नहीं, धार्मिक परंपरा है’

दूसरी ओर, समुदाय के समर्थक वकील निजाम पाशा ने इन आरोपों का खंडन किया। उन्होंने दलील दी कि:

  1. इसे ‘अंग-भंग’ कहना गलत है; यह पुरुषों के खतना की तरह एक धार्मिक प्रक्रिया है।
  2. दाऊदी बोहरा समाज में इस प्रथा को न मानने पर बहिष्कार का कोई प्रावधान नहीं है।
  3. उन्होंने इसे ‘यौन सुख बढ़ाने’ की प्रक्रिया बताया, जिस पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई।

बेंच की सख्त टिप्पणियाँ

  • जस्टिस अमानुल्लाह: उन्होंने पाशा के दावों पर हैरानी जताते हुए कहा कि यह दलील तथ्यों के बिल्कुल विपरीत है। उन्होंने पुरुषों के खतना से इसकी तुलना को भी अनुचित बताया।
  • जस्टिस नागरत्ना: उन्होंने कहा कि यह प्रथा अनुच्छेद 25 के तहत ‘नैतिकता’ के पैमाने पर भी खरी नहीं उतरती।
  • जस्टिस बागची: उन्होंने कहा कि इस प्रथा का मूल उद्देश्य महिलाओं की कामुकता (sexuality) को नियंत्रित करना प्रतीत होता है।

क्यों अहम है यह सुनवाई?

चूंकि FGM का मामला अब सबरीमाला मामले के साथ सुना जा रहा है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि क्या ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ के नाम पर किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता और स्वास्थ्य के साथ समझौता किया जा सकता है। कोर्ट अब इस बात की गहन जांच करेगा कि क्या किसी धर्मगुरु के निर्देश मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं।

बेंच में शामिल न्यायाधीश:

सीजेआई के साथ जस्टिस नागरत्ना, सुंदरेश, अमानुल्लाह, कुमार, मसीह, वराले, महादेवन और बागची।

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